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October 4, 2024जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर धरमनाथ का जीवन श्रद्धा, तप और साधना का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनकी जीवन यात्रा हमें आदर्श और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। आइए, उनके जीवन के प्रत्येक चरण को विस्तार से समझते हैं।
धरमनाथ तीर्थंकर का जीवन परिचय
धरमनाथ का जन्म राजा भानुराज और रानी सुयशा के हुआ था। उनका जन्म इक्ष्वाकु वंश के शासक परिवार में हुआ था, और उनके जन्म से राज्य में खुशहाली और समृद्धि का माहौल फैल गया। धरमनाथ का जन्म उत्तरप्रदेश के रत्नपुरी नगर में हुआ था। जन्म से ही वे शांत और सौम्य स्वभाव के थे, जिससे उनके परिवार और समाज में उनकी प्रशंसा होती थी। बाल्यावस्था में भी वे अध्यात्म और धर्म के प्रति गंभीर रहते थे।
युवावस्था और राजपाठ
युवावस्था में, धरमनाथ ने राजकुमार के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन किया। उनकी वीरता, साहस और नीति के कारण वे अत्यंत लोकप्रिय हुए। उनके न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ शासनकाल में राज्य में सुख-शांति का वातावरण बना रहा। हालांकि वे एक कुशल शासक थे, उनका मन सांसारिक जीवन से विरक्त होने लगा था। उनका लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति और आत्मा की शुद्धि की ओर केंद्रित हो चुका था।
राज्य त्याग और दीक्षा
धरमनाथ ने राज्य की समस्त जिम्मेदारियों को अपने उत्तराधिकारी के हाथों सौंप कर त्याग कर दिया। उन्होंने सांसारिक सुखों को छोड़कर दीक्षा लेने का निर्णय किया। दीक्षा के समय धरमनाथ ने कठोर तप और साधना के मार्ग को अपनाया। उन्होंने अन्न-जल का त्याग कर दिया और अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए कठोर तपस्या करने लगे।
तपस्या और कैवल्य ज्ञान
धरमनाथ ने दीक्षा लेने के बाद कठोर तपस्या की और अपनी आत्मा को ज्ञान के प्रकाश में स्थापित किया। उनकी तपस्या इतनी गहन थी कि उन्होंने अपनी इंद्रियों को पूरी तरह से नियंत्रित कर लिया। उनकी तपस्या से समस्त संसार में शांति का संदेश फैल गया और अनेक लोग उनके तप से प्रभावित होकर उनके शिष्य बने। अंततः, उनकी तपस्या के परिणामस्वरूप, उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। यह वह अवस्था थी जहां उन्होंने संसार के समस्त रहस्यों और वास्तविकता को समझा।
तीर्थंकर पद की प्राप्ति और उपदेश
धरमनाथ तीर्थंकर बनने के बाद उन्होंने समाज को धर्म और अध्यात्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा दी। उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के सिद्धांतों पर बल दिया। उनके उपदेशों में जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा की मुक्ति और संसार के बंधनों से मुक्त होना बताया गया। धरमनाथ ने अपने उपदेशों के माध्यम से हजारों लोगों को मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित किया।
मोक्ष की प्राप्ति
धरमनाथ ने दीर्घकाल तक समाज का मार्गदर्शन किया और अंततः उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति की। वे सम्मेद शिखर पर समाधि में लीन हो गए, जहां से उन्होंने संसार के समस्त कर्म बंधनों से मुक्त होकर निर्वाण प्राप्त किया। धरमनाथ की जीवन यात्रा मोक्ष और आत्मा की शुद्धि की दिशा में निरंतर चलने वाली प्रेरणा है।
निष्कर्ष
धरमनाथ तीर्थंकर का जीवन हर जैन अनुयायी के लिए एक आदर्श है। उनके जीवन के प्रत्येक चरण से हमें धर्म, तप, साधना और आत्मा की मुक्ति का मार्ग मिलता है। उनकी शिक्षा और उपदेश आज भी हमें सही मार्ग पर चलने और आत्मा की शुद्धि के लिए प्रेरित करते हैं।